रिपोर्ट: मनोज सिंह/कनपुर देहात
1970 में बांग्लादेश का विभाजन होने पर पूर्वी पाकिस्तान में रह रहे हिन्दू बांग्लाशियो पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने उन बंगलादेशियो को भारत लागकर उन्हें अलग अलग हिस्सों में बसाया था और कुछ बांग्लादेशियों को मिल में नौकरी तो कुछ को जमीन दी गई थी जिससे ये अपना जीवन बसर कर सके ।
तब से लेकर अब तक ये पहचानी पहचान ना मिल पाने का संघर्ष करते रहे है । कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद से इनका चेहरा खिल गया और जो सरकारी सुविधाएं नही मिल पा रही थी अब पहचान मिलने के बाद उसका लाभ उठा पाएंगे । मेरठ से 63 बांग्लादेशी परिवार को भी अब कानपुर देहात में बसाया जाएगा जिससे इनकी संख्या बढ़ेगी और ये सभी एक साथ रहेंगे ।
कानपुर देहात के रसूलाबाद तहसील क्षेत्र में रह रहे बांग्लादेशियों को 1970 व 80 में बांग्लादेश विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे इन पर अत्याचार को देखते हुए मौजूदा सरकार ने इन हिन्दू बंगलादेशियो को भारत के अलग अलग हिस्सों में लाकर बसाया था इनके गुजर बसर के लिए मौजूदा सरकार ने कुछ को जमीनें दी थी तो कुछ को मिलो में काम दिया था पर 5 साल बाद मिले बन्द हो गई और ये लोग बेरोजगार हो गए ।
बांग्लादेश से आने के बाद से इनको ना तो किसी जात में शामिल किया और नाही इनको अपनी पहचान मिल पाई तब से लेकर अब तक ये अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे थे और सरकार से आस लगाए थे । प्रदेश के पुनर्वास विभाग का 10 साल पहले राजस्व विभाग में विलय हो गया था विभाग से प्रस्ताव तैयार ना हो पाने की वजह से इनके लिए अब पुनर्वास पैकेज कैबिनेट से मंजूर सरकार ने कराया है जिससे इनको अब अपनी एक पहचान मिल पाएगी और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा ।
रसूलाबाद तहसील के पहाड़ीपुर ,इंद्रानगर ,भैसाय,ताजपुर,तरसौली क्षेत्र में सन 1970 में 350 परिवार को पूर्वी पाकिस्तान से भारत लाकर यहां बसाया गया था । इनको जीवन व्यापन के लिए कुछ जमीनें दी गई थी पर जमीन उपजाऊ न हो पाने की वजह से ये अपना गुजर बसर 50 सालो से मजदूरी कर कर रहे है इनको सरकारी लाभ भी नही मिल पा रहा था अभीतक पर अब इनको आस है कि सरकार के इस पैकेज से इन्हें कई योजनाओं का लाभ मिलेगा और इनको अपनी एक पहचान मिल सकेगी ।
बाईट--अमित,बांग्लादेशी, सरणार्थी।
बाईट--मंल्ली, बांग्लादेशी,सरणार्थी
बाईट--समन्त कुमार
पुनर्वास कर यहां रह रहे बांग्लादेशी सरणार्थी ये मानते है कि उन्हें अभी तक अपनी पहचान नही मिल पाने से सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में अभी बहुत पीछे है इनका जीवन सिर्फ अपनी मजदूरी पर टीका हुआ है यहां बेस कुछ सरणार्थी बांग्लादेशी बॉस बल्लियों के टट्टर बनाकर उसे बाजारों में बेचते है जब जाकर उनके घर का चूल्हा जलता है और कुछ दूसरे के खेतों में मजदूरी का अपना परिवार पाल रहे है सरकार के पैसले से इन्हें खुशी है कि अब इन्हें अपनी पहचान मिलेगी और उनके बच्चों को स्कूलों में वजीफा मिल सकेगा । पहचान मिलने परअब इन्हें अपना हक जरूर मिलेगा जिसके लिए पचास सालो से संघर्ष कर रहे थे।
बाईट--प्रमोद कुमार, बांग्लादेशी,सरणार्थी
बाईट--शिव कुमार,बांग्लादेशी सरणार्थी।
बाईट--दीप कुमार, बांग्लादेशी सरणार्थी।
सरकार ने अब ये भी फैसला लिया है कि मेरठ के हस्तिनापुर में 1970 में बसाये गए 63 बांग्लादेश सरणार्थी परिवार को कानपुर देहात के रसूलाबाद में लाकर बसाया जाएगा और इनको इनकी पहचान दी जाएगी । 2009 में मेरठ सीरियल ब्लास्ट के बाद इन पर पैनी नजर रखी जा रही थी तभी से इसकी मांग तेज़ हो गई कि उन्हें कही और विस्थापित किया जाए । क्योंकि इन्हें घुसपैठियों की नजर से ना देखा जाए । इन लोगो को आड़ में बांग्लादेशी घुसपैठिया भी सक्रिय है ।
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